भाजपा का मिशन 2019 : चेहरे से वो पुरानी चमक और जोश गायब है!

Ajit Kumar : भाजपा के मिशन 2014 और मिशन 2019 के बीच एक ही समानता है कि दोनों की शुरूआत दिल्ली के एतिहासिक रामलीला से ही हुई। पर अंतर, यही है कि पिछली दफा मोदीजी को पूर्ण बहुमत के साथ देश का प्रधानमंत्री बनाना था और इस बार अगले पांच साल के लिए विनम्र गुजारिश भरा पेशकश। हां, एक अंतर जो और देखने को मिला, वह यह है कि पिछली दफा मंच पर बैठे नेताओं के चेहरे पर चिंता कम, जोश ज्यादा नजर आती थी। पर, इस बार वो पुरानी चमक और जोश नजर नहीं आई।

चमक ढीली पड़ना स्वाभाविक भी है, क्योंकि जिन प्रदेशों से होकर दिल्ली का रास्ता तय होता है, उनमें से एक (बिहार) में भाजपा जदयू के साथ लोकसभा चुनाव में बराबर सीटों पर लड़ने के फैसले के साथ ही अपना पहला दांव गवां बैठी। और दूसरा, उत्तर प्रदेश में बुआ-भतीजा के बीच आज तय हुआ चुनावी गठबंधन अगर लोकसभा चुनाव तक कायम रह गया, तो यह भी ‘ताबूत में किल’ ही साबित होगी।

मगर, सबसे बड़ी बात यह है कि भाजपा इन बातों से खुद को बेपरवाह दिखाती हुई नजर आयी, और देश भर से आए कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए कहा, ‘ हम अजय योद्धा मोदी के नेतृत्व में चुनाव में उतर रहे हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने यहाँ तक कहा कि विपक्ष के किसी गठबंधन से डरने की जरूरत नहीं, हम पिछली दफा से भी बड़ी जीत दर्ज करने जा रहे हैं।’ सच मानें, तो भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व का यही बड़बोलापन और हेकड़ी उनके कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी समस्या है। कार्यकताओं का मानना है कि आज की तारीख में न तो मोदी अजय योद्धा रहे और न ही हवा का रुख ही पहले जैसी रही। उनका मानना है कि केंद्रीय नेतृत्व अगर अपनी भाषा और शैली पर नियंत्रण नहीं रखा, तो इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

अब आगे चलते हैं। भाजपा भले देशहित में लिए गए फैसले और किए गए कई कार्यों को लेकर अपनी पीठ थपथपा ले, पर आज भी सुदूर गांव-देहातों में बैठे लोग नोटबंदी के दौरान आई और झेली गई समस्याओं की चर्चा करते हुए द्रवित हो जाते हैं। आज की तारीख में उन्हें इस निर्णय के पीछे भाजपा की नीयत से कोई मतलब नहीं। सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का मसला आज भी उनकी समझ से बाहर है। वहीं, दूसरी ओर, एससी एसटी का मसला उनके दिमाग में गहरे से पैठ बनाए हुए है। किसान खाद की अनुपलब्धता को लेकर अलग ही नाराज बैठा है। चुनाव करीब आते-आते मौसम विज्ञानी क्या कुछ खेल दिखा दें, कहना बड़ा मुश्किल है। कुल मिलाकर, भाजपा अगर “आॅल इज वेल” की स्थिति महसूस करती है, तो यह किसी मुगालते से कम नहीं।

आज की स्थिति में भाजपा को दिल्ली की सत्ता पुनः प्राप्त करने के लिए बगैर किसी मुगालते में रहे यूपी और बिहार में अपनी स्थिति का नये सिरे से आकलन करना होगा। साथ ही, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उनके प्रति इतना बड़ा विश्वास व्यक्त करने वालों के मन में उनसे अलग होने का ख्याल कैसे आया, पर भी मंथन करना होगा कि आखिर चूक कहां हुई? कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि भाजपा के लिए अभी का समय ‘चमचों’ से अलग रहते हुए आत्म चिंतन और सावधान रहने का समय है। अगर, सावधानी हटी, तो दुर्घटना होना तय है।

लेखक अजित कुमार पटना में बतौर वकील और फ्रीलांस जर्नलिस्ट सक्रिय हैं.

भक्त

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