चौकीदार के रहते चोरी हो गई?

शंभू चौधरी

जबसे मोदी जी ने प्रधानमंत्री पद को सुशेभित किया है तबसे ‘चौकीदार’ शब्द की गरिमा को गहरा सदमा लगा है। एकतरफ ‘चायवाले’ सबके सब जश्न माना रहे थे कि उनकी जमात का एक ‘भाई’ प्रधानमंत्री बन गया, तो वहीं दूसरी तरफ ‘चौकीदारी’ पेशे से जुड़े लोगों को हर तरफ शक की निगाह से देखा जाने लगा । विपक्ष ताबड़तोड़ ‘चौकीदारी चोर है!’ बोल-बोलकर ऑक्सफ़ोर्ड की डिक्शनरी में ‘चौकीदार’ शब्द की नई परिभाषा गढ़ने में तुला हुआ है।

जब ‘चोर की दाड़ी में तिनका’ हो तो चोर कितना भी शातिर, चालाक क्यों न हो कोई न कोई निशानी जरूर छोड़ देता है। कुछ ऐसा ही राफेल के सौदे को लेकर उच्चतम न्यायालय के पिछले फैसले में हुआ- जब माननीय उच्चतम न्यायालय ने ‘शीलबंद’ लिफाफे की सुनवाई करते हुए अपना एकतरफा फैसला सुना कर चौकीदार की वफ़ादारी पर मोहर लगा दिया था, तो इस फैसले के साथ भी यही हुआ।

एक दिन ऐसा भी आया जब फ्रांस की कंपनी दसाॅल्ट से 36 राफेल विमान सौदे पर प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी की जिसे याचिका को उच्चतम अदालत ने रद्द कर दिया था पुनः उनकी दलीलों पर सुनवाई करने करा फैसला खुली अदालत में करने का निर्णय ले लिया गया और पुनरीक्षण याचिकाओं पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में पुनः सुनवाई हुई ।

इस बार उच्चतम अदालत का रूख कुछ अलग था । जहां एक तरफ सरकार बचाव की मुद्रा में खड़ी देश की सुरक्षा की दुहाई दे रही थी और अदालत को इशारों-इशारों में यह बताने का प्रयास किया जा रहा था कि चौकीदार का अर्थ है ‘‘सुप्रीमो ऑफ इंण्डिया’’ साथ ही जिस सच को छुपाने का शीलबंद लिफाफे का खेल केन्द्र की सरकार ने उच्चतम अदालत की प्रतिष्ठा का दाव में लगा कर खेला, जब इसका सच हिन्दू समाचार पत्र ने सार्वजनिक कर दिया तो, सरकारी वकील व अटाॅर्नी जनरल वेणुगोपाल ने अदालत से कहा कि वे दस्तावेज जो हिन्दू समाचार और एएनआई में छपे व चोरी किये गए दस्तावेज हैं।

अर्थात सरकार यह मानती है कि उन दस्तावेजों में जो कुछ भी लिखा हुआ है वह सच तो है पर चोरी किये हुए दस्तावेज़ हैं। सरकार स्वीकार करती है कि प्रधानमंत्री का सीधा हस्तक्षेप राफेल के सौदे में था पर वह चूंकि दस्तावेज चोरी किये गये हैं इसलिये वह अपराध की श्रेणी में नहीं आ सकते।

अर्थात सरकार गोपनीयता व सरकारी दस्तावेज गोपनीयता कानून की दुहाई देकर यह बताने का प्रयास कर रही है कि उसने खून तो किया है पर यह खून अपराध नहीं है। इसलिये इसकी जांच कोई नहीं कर सकता और अदालत को भी इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये।

जब से मोदी की सरकार आई है तब से देश भक्ति के नाम पर कुछ भगवाधारण गिरोह ‘मोदीभक्त’ बनकर गाहे-बगाहे देश में देश भक्ति का नया अर्थ गढ़ रहें हैं। कभी देश भक्ति, कभी हिंदुओं की रक्षा, तो कभी देश की सुरक्षा, मोदी सरकार का सारा जबाब इसी केन्द्र बिंदु पर आकर सिमट जाता है।

सवाल उठता है एक भ्रष्ट चौकीदार अपने बचाव में देश की सुरक्षा की दुहाई कब तक देता रहेगा? क्या राफेल की सारी फाइलें जब इनका कार्यकाल समाप्त हो जायेगा तो जला दिया जायेगी या गायब कर दिया जायेगी अथवा मोदी जी की कार्यकाल की सभी फैसले देश की सुरक्षा के नाम पर तहखाने में भारत सरकार दबाकर रख देगी ? क्या उच्चतम अदालत, बंद अदालतों में ही सभी फैसले किया करेंगी और निर्णय की जगह खाल रख की देश की सुरक्षा की दुहाई देगी जैसा केग ने किया है?

आज उच्चतम अदालत को यह भी सोचना होगा कि देश की सुरक्षा की दुहाई देकर मोदी सरकार ने 130 करोड़ जनता के विश्वास पर जो गद्दारी की है, जिसने देश की सुरक्षा को व्यापार में बदल दिया, जिसने कैग की रिपोर्ट से भी आंकड़ों को मिटा दिया, जिसने उच्चतम अदालत को कह दिया कि ‘‘उच्चतम अदालत को ‘‘इज और हैज’’ नहीं मालूम’’, जो सरकार राफेल के सौदे पर लगातार झूठ पर झूठ बोल रही है। इस सौदे का सबसे बड़े लाभार्थी एक पत्रकार पर 5000 करोड़ का मानहानि का दावा ठोक सकता है। अदालत को उस लाभार्थी से भी यह तो जरूर पूछना चाहिये कि आपके के स्वामित्व वाली रिलायंस कम्युनिकेशंस जब खुद को दिवालिया घोषित कर रही है तो आपकी कीमत 5000 करोड़ की आंकी जाए या दो कौड़ी की?

आज उच्चतम अदालत के हाथ में देश का भविष्य उम्मीद की आस लगाये बैठा है। देश की सुरक्षा के नाम पर जो सौदेबाजी चल रही है इसपर विराम लगाने का समय आ गया है। दस्तावेज यदि सही है तो भले ही वे दस्तावेज चोरी से लाये गये हैं सरकार या तो इस दस्तावेज का सिरे से इंकार करे कि अन्यथा अदालत को चाहिये कि इसपर संज्ञान लेते हुए, चौकीदार की इस चोरी और धोखाघड़ी पर कठोर से कठोर फैसला लें ताकि भविष्य में कोई भी प्रधानमंत्री ऐसा करने की जुर्रत ना कर सके। जयहिन्द!

लेखक शंभु चौधरी स्वतंत्र पत्रकार और विधिज्ञाता हैं।

भक्त

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