”देशहित” नहीं होता गेस्ट हाउस नहीं होता, और फिर दोस्ती नहीं होती

मेरा मानना है कि बहुतेरे लोग देशहित का काम नहीं करते हैं. हमारे पिताजी ने कभी देशहित का काम नहीं किया, शायद मैं भी अभी तक देशहित में कोई काम नहीं कर पाया हूं. मुझे लगता है कि आम जनता कभी भी देशहित में काम नहीं कर सकती. जनता देशहितैषी नहीं होती है शायद! आम जनता को देशहित से कोई मतलब नहीं होता है शायद. देशहित में काम केवल राजनेता, पार्टियां, सरकारी अधिकारी या फिर पुलिस वाले ही कर सकते हैं. सेना वाले भी देशहित में कुछ नहीं करते, और किसान तो खैर देशहितैषी होता ही नहीं है!

देशहित से बड़ा कोई हित नहीं होता. अपना भी नहीं, परिवार का तो कतई नहीं. देशहित के बारे में मुझे बिल्‍कुल जानकारी नहीं थी, लेकिन जब गुलफाम मियां ने देशहित में गांजा पार्टी से इस्‍तीफा दिया, तब पता चला कि किसी पार्टी से इस्‍तीफा देना देशहित में होता है. फिर देशहित में उन्‍होंने भांग पार्टी ज्‍वाइन किया, तब जानकारी हुई कि दूसरी पार्टी ज्‍वाइन करना भी देशहित होता है. मेरी देशहित की जानकारी अभी परिपक्‍व हो ही रही थी. मैं देशहित को कुछ-कुछ समझने लगा था, कि देशहित में लिये गए एक फैसले ने मुझे फिर से कन्‍फ्यूज कर दिया.

दरअसल, जिस गुल्‍लू पहलवान को हमारे जैसी आम जनता भ्रष्‍टाचारी, अपराधी, हत्‍यारा, गुंडा और माफिया मानकर बुरा आदमी समझती थी, अफीम पार्टी ने देशहित में अपने दल में शामिल कर लिया. नेताजी ने बताया कि गुल्‍लू को देशहित में पार्टी में शामिल किया गया है, इससे दलित और ओबीसी समाज को मजबूती मिलेगी. मैं तनाव में आ गया कि एक अपराधी भी देशहित करता है, और हम जैसे लोग देशहित को समझ नहीं पाते हैं. पहले मैं इस्‍तीफा देने और ज्‍वाइन करने को देशहित समझता था, अब शामिल करना भी देशहित हो गया.

खैर, देशहित को लेकर अब मेरी समझ थोड़ी विकसित होने लगी है, लेकिन इतनी भी नहीं कि कोई देशहित कर सकूं. देशहित की महता तब थोड़ी और ज्‍यादा समझ आ गई जब एक नेताजी और एक दूसरे नेताजी एक ही पार्टी से एक ही विधानसभा का एक ही टिकट पाने के लिये देशहित में आपसे में कुटमकुटाई कर बइठे. एक दूसरे का थुथुन कूंच दिया. बंदूक चल गई. चक्‍कू भी. गाली-ग्लौज तो खैर सेतिहा में हो गया. तब पहली बार लगा कि देशहित छोटी-मोटी चीज नहीं है. देशहित में जान भी लिया और दिया जा सकता है.

हमारे अदेशहितैषी पिताजी बताते हैं कि एक बार के देशहित की बात है, एक नेताजी के लोग उनके एक पुत्र की एक बुआजी को देशहित के चक्‍कर में एक गेस्‍ट हाउस में घेर लिया. वहां खूब देशहित की बातें हुईं. इसके बाद बुआजी ने देशहित में निर्णय लिया कि अब रिश्‍तेदारी खत्‍म. तब पहली बार बुझाया कि देशहित बहुत छोटा सब्‍जेक्‍ट नहीं है. यह देशहित ही था कि एक भाई देशहित के चक्‍कर में गेस्‍ट हाउस पहुंच गया तो दूसरा भाई देशहित के प्रयास में राखी बंधवा लिया. बाद में देशहित में भाई और बहन ने राखी बंधन से किनारा कर लिया.

बस इस घटनाक्रम की जानकारी मिलने के बाद देशहित को भीतर तक, अंदर तक जानने को लेकर उत्‍सुकता बढ़ने लगी. देशहित पर रिसर्च शुरू किया तो पता लगा कि देशहित के लिये तो लोग एक दूसरे की जान तक ले लेते हैं. एक नेताजी ने भतीजे के बुआजी को देशहित में पैसा देकर विधायकी का टिकट खरीद लिया. बुआजी ने भी देशहित में ही टिकट बेच दिया. दरअसल, असली देशहित टिकट बेचने और खरीदने में ही है. टिकट और कुर्सी के लिये मारामारी, खरीद फरोख्‍त भी देशहित में होती है. दरअसल, देशहित में सब कुछ भूला भी जा सकता है, कभी कभी दे‍शहित भी. लग रहा है कि अगर यह देशहित नहीं होता तो कितना बुरा होता?

इस व्यंग्य के लेखक अनिल सिंह दिल्ली में लंबे समय तक टीवी और वेब पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों लखनऊ में ‘दृष्टांत’ मैग्जीन में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. उनसे संपर्क 09451587800 या [email protected] के जरिए कर सकते हैं.

भक्त

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1 comment

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  • बढ़िया है भाई देशहित में लिखते रहिये

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