मोदी आएं न आएं, अच्छे दिन तो आएंगे ही!

संभव है अगले दो साल भारत की अर्थव्यवस्था में फिर से वही बहार ले आएं!

Ashwini Kumar Srivastava

मोदी आएं न आएं…अच्छे दिन तो आएंगे ही…! आर्थिक मोर्चे पर देश फिलहाल कठिन दौर से ही गुजर रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं है। नोटबन्दी और जीएसटी ने देश में उद्योग-धंधों और बाजार को इस कदर मुश्किलों में डाले रखा कि 2016, 2017 और 2018 के तीन साल देश की अर्थव्यवस्था के लिए बैक गियर सरीखे ही साबित हो गए।

हालांकि मेरा यह भी मानना है कि अब चंद महीनों से उद्योग-धंधों में स्थिरता व थोड़ा सकरात्मक माहौल बनने से अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर लौटने लगी है। यह भी सम्भव है कि 2019 और 2020 के अगले दो साल भारत की अर्थव्यवस्था में फिर से वही बहार ले आएं, जिसके चलते अमेरिका, यूरोप और चीन जैसी आर्थिक महाशक्तियों को भी हमसे खतरा महसूस होने लगा था।

जाहिर है, ऐसा हुआ भी तो शायद मोदी सरकार इस बहार का श्रेय लेने के लिए दिल्ली के तख्त पर काबिज न हो। फिलहाल तो जिस तरीके से तीन साल तक अर्थव्यवस्था ने बैक गियर लगाया है, उसी की गालियां खाते-खाते ही इस सरकार के आखिरी चंद माह बीत जाएंगे।

दरअसल, आर्थिक मोर्चे पर इस सरकार को पड़ रही गालियां एक तरह से वाजिब भी हैं क्योंकि जिस मूर्खतापूर्ण तरीके से नोटबन्दी लागू करके काले धन का हौवा इस सरकार ने खड़ा किया था, उसी ने उद्योग-धंधों के साथ-साथ समूचे बाजार को ही कोमा में पहुंचा दिया था। खोदा पहाड़ निकली चुहिया की मिसाल बन चुकी नोटबंदी से जो कसर रह गई थी, वह इस सरकार ने आननफानन में जीएसटी लागू करके पूरी ही कर दी थी। नोटबंदी और जीएसटी की दोहरी मार से भारत की अर्थव्यवस्था बुरी तरह औंधे मुंह गिरी और तीन साल से इसके सदमे में ही है।

चूंकि भारत की अर्थव्यवस्था बाकी दुनिया की विकसित अर्थव्यस्थाओं की तरह महज बाजार आधारित अर्थव्यवस्था नहीं है , इस कारण हमारा देश हर तरह के आर्थिक झंझावात झेल कर दोबारा उठ खड़ा हो जाता है। नोटबंदी और जीएसटी तो खैर सेल्फ गोल थे मगर जब 2008 में दुनियाभर में आर्थिक मंदी आई थी, तब भी हमारे देश ने बाकी दुनिया के मुकाबले कम नुकसान झेला था। इसकी बहुत सी वजहें हैं मगर सबसे बड़ी वजह यहां की जबरदस्त आबादी, इस आबादी के चलते घरेलू बाजार में बनी रहने वाली जबरदस्त मांग, छोटे बचतकर्ता और नकदी आधारित अर्थव्यवस्था ही प्रमुख हैं।

हैरत की बात यह है कि न जाने किन आर्थिक समझदारों के बहकावे में आकर मोदी सरकार ने हमारी अर्थव्यवस्था की ताकत समझे जाने वाले इन कारकों पर ही निशाना लगा दिया था। और, नासमझी भरे तरीके से काले धन की तलाश करते हुए नकदी आधारित अर्थव्यवस्था की चूलें ही हिला दी थीं, नोटबंदी के रूप में बाजार से लंबे समय तक नकदी ही गायब करके।

खैर, अंत भला तो सब भला से ही संतोष करते आये हमारे देश में लोग नोटबंदी और जीएसटी का रोना अब नहीं रो रहे बल्कि एक बार फिर नकदी या अन्य तरीकों से बाजार में खरीदारी में जुट गए हैं। आबादी के मामले में दुनिया में नंबर एक बनने को अग्रसर भारत के लोगों की यही खरीदारी ही हर बार अर्थव्यवस्था में नई जान डाल देती है। इस बार भी बाजार में बढ़ती मांग कुछ कुछ यही इशारा कर रही है। बस जरूरत है धैर्य बनाये रखने की।

लखनऊ निवासी लेखक अश्विनी कुमार श्रीवास्तव लंबे समय तक पत्रकार रहे और अब रीयल इस्टेट फील्ड में सक्रिय हैं.

भक्त

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