अच्छा हुआ जल्दी ही छंट गया गोयबल्सी मायाजाल!

नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते ही यह स्पष्ट हो चुका था कि उन्हें दो चीजों से बहुत प्यार है―एक, हवाबाजी और दूसरा बड़े धन्नासेठ। इन दोनों के घालमेल से ही अमेरिकी पीआर कंपनी ने 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले ही ऐसा तूफान खड़ा किया कि कॉर्पोरेट घरानों के गोदी मीडिया ने उसे ‘मोदी लहर’ और ‘मोदी मैजिक’ जैसे नाम देने में देर नहीं लगाई। नतीजतन नरेंद्र मोदी के रूप में देश की सत्ता पर एक ऐसा आदमी काबिज हो गया जिसे इस देश की समझ बिल्कुल भी नहीं थी।

कुर्सी पर बैठते ही मोदी ने जो पहला नीतिगत फैसला लिया उसने देश के करोड़ों श्रमिकों का गला निर्ममता से काट दिया। इसके जरिये एक सौ से अधिक कामगारों वाली कंपनियों को जब चाहे बिना कारण बताये किसी भी श्रमिक को निकाल बाहर करने का अधिकार दे दिया गया, जिसके विरुद्ध किसी भी न्यायिक मंच पर सुनवाई नहीं हो सकेगी। बतौर प्रधानमंत्री कॉर्पोरेट को खुश करने वाला मोदी का वह पहला काम था। इसके साथ ही शुरू हो गया धन्नासेठों द्वारा देश के संसाधनों की लूट का सिलसिला, जो अब तक निरंतर जारी है।

इसी बीच गोदी मीडिया ने पहले ‘नमो’ और फिर बाद में ‘मोदी’ को ब्रांड बनाने का खेल शुरू कर दिया। मोदी-मोदी की 24X7 ऐसी ‘रामधुन’ गाई जाने लगी कि लोगों को इसकी बदहजमी होने लगी क्योंकि ब्रांड ‘मोदी’ का अस्तित्व सिर्फ गोदी मीडिया के स्टूडियोज और छापाखानों में ही था, धरातल पर नहीं। यदि सचमुच में ऐसा होता तो शाह-मोदी के नेतृत्व में भाजपा गुजरात, गोवा, मणिपुर में अल्पमत में न आती और उसे इन राज्यो में धनबल से सत्ता पर कब्जा नहीं करना पड़ता।

इसके अलावा 2014 के बाद हुए लोकसभा के उप-चुनाव में महाराष्ट्र की पालघर तथा एक सीट कर्नाटक के अतिरिक्त ये कोई सीट नहीं निकाल सके। इसके उलट लोकसभा में भाजपा के सदस्यों की संख्या 282 से घटकर 272 ही रह गई। तो बताइए कि वह लहर या मैजिक इतनी जल्दी कहाँ गायब हो गया? यदि देखा जाये तो वह सब देसी-विदेशी कॉर्पोरेट के पैसे से फैलाया गया नाजी जर्मनी के कुख्यात तानाशाह हिटलर के सचिव गोयबल्स के चरणचिह्नों पर चलते हुए संघ-भाजपा का फैलाया मायाजाल था जो अब कुछ हद तक छंट गया है।

हालांकि देश के संसाधनों की लुटेरी कॉर्पोरेट गैंग इतनी जल्दी हार मानने वाली नहीं है। वह अपने पालतू मीडिया के माध्यम से हर चुनाव में यह बात उभारती है कि नरेंद्र मोदी का ‘मैजिक’ व शाह का ‘करिश्मा’ बरकरार है। बड़े सुनियोजित तरीके से प्रत्येक जीत का सेहरा प्रधानमंत्री मोदी के सिर पर बांधा जाता है, लेकिन हार होने पर उसका ठीकरा किसी दूसरे के सिर पर फोड़ दिया जाता है। मप्र., राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के हालिया विधानसभा चुनावों में ‘कमल खिलाने’ को माहौल बनाने और संभावित हार को जीत में बदलने का जो ‘मोदी मैजिक’ प्रचारित किया जाता रहा है, काम नहीं आया।

छत्तीसगढ़ में लगातार तीन बार के सत्ताधारी रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा को जनता ने जितने जोरदार तरीके से नकारा है उससे साफ होता है कि वहां मोदी की रैलियों का कोई असर नहीं हुआ और माहौल को मोदी का बहु-प्रचारित ‘मैजिक’ बदल नहीं पाया।

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान भी चौथी बार सत्ता पर काबिज होने की कोशिश में थे। वहां काग्रेस को रोकने के लिए तमाम तरह के हथकंडे आजमाने के बावजूद भाजपा को कांटे की टक्कर मिली और अंततोगत्वा कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हो गई। क्या गोदी मीडिया वहां मोदी का जादू चलने का कोई सबूत दे सकता है?

उधर राजस्थान में तो चुनाव की घोषणा होने से पहले ही जिस तरह प्रदेश की राजधानी जयपुर में हुई रैली में जनता ने मोदी का ‘स्वागत’ किया था उससे ही ‘मोदी मैजिक’ के सफाये का अनुमान हो गया था। वहां मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के रवैये के खिलाफ जनता शुरू से ही थी तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह व वसुंधरा राजे के खराब रिश्तों की चर्चा भी थी। लोगों में बदलाव की चाह इतनी प्रबल और नेताओं के प्रति इस कदर गुस्सा था कि मोदी के प्रचार से भी पार्टी को राजस्थान में करारी हार से नहीं बचाया जा सका।

तो इन चुनावों में यह साफ हो गया है कि गोदी मीडिया के बहु-प्रचारित मोदी का कथित ‘मैजिक’ या ‘लहर’ जैसी कोई चीज नहीं है। धन्नासेठों के प्रिय ‘मोदी ब्रांड’ की चुनावी राजनीति में कोई खास वैल्यू नहीं है। इन चुनावों ने सबकुछ साफ कर दिया है। भाजपा और मोदी भक्त जिस तरह हिंदी फिल्म दीवार के डायलॉग ‘मेरे पास मां है’ की तर्ज़ पर ‘मेरे पास मोदी है’ की ‘रामधुन’ बजाया करते थे, उसका ‘गोदी क्रेज’ भी खत्म हुआ।

अब मोदी की भी छवि एक दागदार नेता के तौर पर बन चुकी है और उनकी 56″ छाती को लेकर अनेक सवाल खड़े होने लगे हैं। लोग सवाल पूछने लगे हैं कि लगभग डेढ़ सौ लोगों की बलि लेने वाली नोटबंदी, जीएसटी, जीरो बैलेंस खातों से देश को क्या लाभ हुआ? जनता से वसूली कर धन्नासेठों को बिना गारंटी के अनाप-शनाप ऋण कैसे व क्यों दिये गये? देश की कृषि, उद्योग, व्यापार, छोटे व्यवसाय, निर्यात, पारस्परिक सद्भाव आदि सबकुछ क्यों चौपट कर दिया गया? मोदी के तूफानी विदेशी दौरों से कितना पूंजी निवेश आया? RBI, CBI, EC, CVC, IC, CAG, ED व अन्य संवैधानिक संस्थाओं तथा मीडिया के कामकाज में हस्तक्षेप क्यों किया जा रहा है? गौरक्षा के नाम पर अराजकता को सरकारी संरक्षण क्यों दिया जा रहा है? मोदी के खाते में उपलब्धियों की अपेक्षा बर्बादियां अधिक क्यों हैं?

वस्तुत: मोदी ‘मैजिक’ या ‘लहर’ न कभी थी और न ही अब है। उत्तर प्रदेश जहां भाजपा को इतना भारी बहुमत मिला था वहां भी जन-आक्रोश में वृद्धि ही हुई है। एक साल पहले तक पार्टी के आसानी से 2019 में फिर सत्ता में आने के कयास लगाये जा रहे थे, अब वैसी निश्चिंतता नहीं रही। इसके उलट इन पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा ने बड़े कॉर्पोरेट घरानों के धन से जो धुंआधार प्रचार किया, उसमें धार नहीं बल्कि सब धुआं ही धुआं था।

इस प्रकार मोदी शासन के इन 55 महीनों में संघ और उसके जेबी संगठन भाजपा व शाह-मोदी की जोड़ी ने जिस तरह निरंतर बदजुबानी, कीचड़, झूठ, जुमलेबाजी, गलतबयानी आदि से सना हुआ बेशर्मी की हद तक नकारात्मक रवैया अपनाया, उससे लोगों को मोदी एक बोझस्वरूप ही समझ आये हैं। मप्र., राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा को उम्मीद के परे जिस करारी हार का सामना करना पड़ा है उससे लोगों ने राहत की सांस ली है। आमजन यह देख कर स्वयं को सांत्वना देता लग रहा है कि चलो अच्छा हुआ, देश से जल्दी ही गोयबल्सी मायाजाल छंट गया !

श्यामसिंह रावत

वरिष्ठ पत्रकार

उत्तराखंड

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भक्त

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