मोदी ने झूठे सपने दिखाए, अब बदलाव की जरूरत

डा. शशि तिवारी

कुछ चीजें हमें प्रकृति से सीखना चाहिए यूं तो प्रकृति हमें बहुत पहले से ही शुभ- अशुभ का संदेश देना शुरु कर ही देती है। ये हमारा ज्ञान ही है कि हम उसे स्पष्ट न केवल देख पाते है बल्कि सर्तक भी हो जाते हैं। लेकिन, हमारा अज्ञान, देखकर भी चीजों को नकारता ही रहता हैं, लेकिन घटाएं तो घटती ही रहती हैं। जब पूर्व का अनुभव और बदलाहट में तादात्म्य स्थापित हो जाता हैं तो आगे सफलता की गुर्जाइंश बढ़ जाती हैं लेकिन इससे भी इतर कभी अप्रत्याशित बदलाव भी होते हैं। लेकिन हमारा अज्ञान उसे जल्दी से सीधे नहीं मानता।

2014 के लोकसभा चुनाव में जब एक राज्य का मुख्यमंत्री जो अपने ही प्रदेश में बहुचर्चित गोधरा हत्या काण्ड की आग में झुलसा तब पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपई ने राजधर्म निभाने की सलाह दी थी। समय का चक्र ऐसा घूमा कि वह अर्थात देश की राजनीति के पटल पर एक आंधी के रुप में पूरे भारत में केन्द्र की राजनीति में एक चमकता एवं चमत्कारिक चेहरा नरेन्द्र मोदी न केवल भारत बल्कि विश्व पटल पर भी अपनी एक अलग ही छवि बनाई। किसी भी राजनीति के पण्ड़े ने ऐसा ओर इतना नही सोचा था, लेकिन परिणाम हम सबके सामने है। दूसरा यूं तो राजनीति में वंशवाद, परिवारवाद न तो कोई नई बात है और न ही इससे कोई भी राजनीतिक पार्टी अछूती नही है अन्तर मात्र अपने विभिन्न अजीबों गरीब तर्को से जनता को भरमाने का हैं।

नेहरु गांधी परिवार के राहुल गांधी जिन्हें विपक्ष कई नामों से समय-समय पर अलंकृति करता रहा हैं, यह एक स्वभाविक क्रिया है। शालीनता से भरे व्यक्तित्व के धनी राहुल गांधी का जब राजनीति में प्रवेश हुआ और लगातार कांग्रेस चुनाव हारती रही उस विपरीत परिस्थिति में भी राहुल ने हिम्मत नही हारी। कांग्रेस अध्यक्ष की ताजपोशी के बाद राजनीति के दल-दल में विपक्ष ने कीचड़ का उछालना कम नहीं किया लेकिन गुजरात के चुनाव में जब भाजपा ने अबकी बार 150 पर का नारा दिया और वह 100 के अंदर के ही सिमट गई बस, यहीं से भाजपा को बदलाव का संकेत समझ लेना थ लेकिन अहंकार विवेक को नष्ट कर देता है। त्रिकालदर्शी रावण भी इससे नहीं बच पाया। पांच राज्यों के विधान सभा के चुनाव में तीन बड़े हिन्दी भाषी राज्य म.प्र. राजस्थान छत्तीसगढ़ में भाजपा को अंहकार का परिणाम देखने को मिला। निःसंदेह भाजपा के लिए यह किसी गहरे आघात से कम नहीं था।

तीसरा प्रिंयका गांधी जिनके लिए उत्तर प्रदेश कोई नया नहीं हैं। कहा भी जाता है जिस पर भी मां गंगा की कृपा हुई वही प्रधानमंत्री बना। अभी तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उनमें से 50 प्रतिशत लोगों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्ंबध उत्तरप्रदेश से रहा हैं। यू तो प्रियंका का राजनीति में पदापर्ण 1999 से ही उत्तर प्रदेश में अपनी मां सोनिया गांधी एवं भाई राहुल गांधी के लिए परोक्ष रुप से राजनीति की क ख ग सीखती रही। इन 20 वर्षो में उत्तर प्रदेश का बदलता मिजाज भी बड़ी नजदीकी से देखा यूं तो नेहरु इंदिरा का सम्बंध भारत की स्वतंत्रता के पहले से ही रहा हैं जहां पहले भारत की राजनीति ही इलाहबाद अब प्रयाग से शुरु होती थी या यूं कहे संचालित होती थी।

इसलिये भी नेहरु गांधी परिवार का एक तरह से खानदानी घर ही है विगत दो दशकों से कांग्रेस अपनी गलतियों, तो कभी अहंकार के चलते मृत प्रायः से पड़ी रही। लेकिन समय भी अपनी नियति का इंतजार करता है अब 20 वर्षो बाद फिर युवा कांग्रेस नेत्री एवं महासचिव को उत्तर प्रदेश में सक्रिय राजनीति में देश की राजनीति में परिवर्तन के लिये उतारा गया हैं। कुछ नकारात्मक सोच वालों की सोेच है कि भाई राहुल गांधी राजनीति में बांछित नही चल पा रहें। यहां यह स्पष्ट समझ लेना जरुरी है कि काग्रेंस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका को तभी राजनीति में उतारा जब वो तीन बड़े हिन्दी राज्यों में अपनी सूझ-बूझ से कांग्रेस पार्टी को वापस लाए। निःसन्देह प्रियंका को पहले भी लाया जा सकता था। कोई किसी प्रकार की रुकावट भी नहीं थी। फिर भी नहीं लाया गया। शायद यही समय की नियति थी।

कांग्रेस अपनी एक-एक चाल बड़ी ही होशियारी से सूझ-बूझ से चल रही है तभी तो युवा एवं लोकप्रिय म.प्र. की धड़कन ज्योतिरादित्य सिंधिया जिनको भी कांग्रेस का महासचिव बना पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जिम्मा सौपा प्रियंका एवं ज्योतिरादित्य सिंधिया की अपनी एक विशिष्ट राजनीतिक शैली है जो युवाओं को अपनी और आकृषित करती है। उत्तर प्रदेश की जनता जो विगत 20 वर्षो से धर्म राजनीति के पाटों के बीच पिस रही है उसने बासपा और सपा को भी देखा, जांचा परखा है।

निःसन्देह परिवर्तन ही विकास है ऐसा लगता है अब शायद परिवर्तन की लहर सी चल रही है अभी ज्यादा अपेक्षाएं ठीक भी नहीं है। राजनीति में ज्यादा अपेक्षाएं हमेशा घातक सिद्ध होती है। इसका ज्वलंत उदाहरण स्वंय नरेन्द्र मोदी है बहुत आशाएं, बहुत सपने जनता को दिखाना ही उनके विरुद्ध जा रहा है। वैसे भी तवे पर रोटी एक तरफ ही रहे तो जल जाती है। रोटी जले न इसीलिए अदली- बदली जाती है। इसी तरह सरकारों को भी बदलते ही रहना चाहिए ताकि उनमें अहंकार न उत्पन्न हो, वे सेवक ही रहें, मालिक न बनें।

लेखिका शशि ‘सूचना मंत्र’ की संपादक हैं.

भक्त

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