क्या मुखर्जी देशभक्त थे?

नेहाल रिज़वी

हिंदुत्व ब्रिगेड डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक ऐसा महान राष्ट्रवादी और देशभक्त बताता है, जिसने देश की एकता और अखंडता की रक्षा की ख़ातिर अपनी जान क़ुर्बान कर दी. प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें एक महान राजनेता,चिंतक और देशभक्त बताया, जिसने राष्ट्रीय एकता को मज़बूत करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. डॉ मुखर्जी की देशभक्ति के संबंध में जो कुछ कहा जाता है,उसकी पुष्टि तत्कालीन दस्तावेज़ों से की जा सकती है.चाहे वे दस्तावेज़ RSS और हिन्दू सभा के अभिलेखागारों से ही क्यों न लिए गए हों.

इन दस्तावेज़ों के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी के एक ‘निस्वार्थ और जन्म से ही महान देशभक्त’ होने के दावे सफ़ेद झूठ है. डॉ मुखर्जी ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध स्वाधीनता आंदोलन में कभी भी भाग नहीं लिया. अगर देशभक्ति का अर्थ है स्वाधीनता संग्राम में भाग लेना और इस संघर्ष के लिए क़ुर्बानी करना है तो, तो डॉ मुखर्जी किसी भी पैमाने पर देशभक्ति सिद्ध नहीं होते. डॉ मुखर्जी ने न केवल स्वाधीनता संग्राम से दूरी बनाए रखी उन्होंने ब्रिटिश शासकों और मुस्लिम लीग के साथ मिलकर ब्रिटिश विरोधी स्वाधीनता आंदोलन को कुचलने और उसे साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने की हर संभव कोशिश की. उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के साथ विश्वाशघात किया.

वे स्वतंत्रता से पहले हिन्दू महासभा के प्रमुख नेताओं में से एक थे. हिंदू महासभा का नेतृत्व वी. सी. सावरकर कर रहे थे. जब 1942 में कांग्रेस ने ब्रिटिश शासकों से तुरंत भारत छोड़ने का आह्वान किया और भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, तब अंग्रेज़ सरकार ने इस जन-आंदोलन के विरुद्ध दमन चक्र शुरू कर दिया.

कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया. कांग्रेस की प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया और पूरे देश को एक विशाल जेल में बदल दिया गया. ब्रिटिश शासकों और देशी राजाओं की सेनाओं दुआरा चलाए गए दमन चक्र में हज़ारों लोग मारे गए. कई लोगों को सिर्फ़ इस लिए अपनी जान गंवानी पड़ी क्योंकि वे अपने हाथों में तिरंगा झंडा थामे हुए थे.

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों हिन्दू महासभा व RSS और मुस्लिम राष्ट्रवादी संगठन मुस्लिम लीग ने न केवल भारत छोड़ो आंदोलन का बहिष्कार किया बल्कि इस आंदोलन का दमन करने में ब्रिटिश सरकार का साथ भी दिया.

हिन्दू महासभा के अध्यक्ष ‘वीर’ सावरकर ने हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की इस गिरोहबंदी की चर्चा सन 1942 में कानपुर में आयोजित हिन्दू महासभा के 24वें अधिवेशन में दिए गए अपने भाषण में की. हिन्दू महासभा दुआरा अपने कार्यकर्ताओं को अंग्रेजों के साथ सहयोग करने का निर्देश देने के बाद, हिंदुत्ववादियों के प्रतीक पुरुष डॉ मुखर्जी ने 26 जुलाई, 1942 को लिखे अपने पत्र में अंग्रेज़ आकाओं को आश्वस्त किया कि वे उनके साथ हैं.

उन्होंने लिखा: अब मैं उस स्थिति की चर्चा करूँगा, जो कांग्रेस दुआरा शुरू किए गए व्यापक आंदोलन के कारण प्रांत में बन सकती है. ऐसा कोई भी व्यक्ति, जो युद्ध के दौरान जन भावनाऐं भड़काए व जिसके कारण आंतरिक गड़बड़ियां और असुरक्षा का भाव उत्पन्न हो, उसका विरोध करना हर उस सरकार का कर्तव्य है जो तत्समय कार्यरत हो..

बंगाल के गवर्नर को लिखे अपने एक पत्र में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए ठोस सुझाव दिए. उस समय बंगाल के
सरकार का नेतृत्व फज़लुल हक़ कर रहे थे और हिन्दू महासभा, सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा थी मुख़र्जी प्रान्त के उपमुख्यमंत्री थे.

उन्होंने लिखा : प्रश्न यह है कि बंगाल में इस भारत छोड़ो आंदोलन से कैसे निबटा जाए? प्रान्त का प्रशासन इस तरह से चलाया जाना चाहिए कि कांग्रेस द्वारा हर संभव कोशिश करने के बाद भी, यह आंदोलन प्रान्त में जड़ पकड़ने में असफल रहे. हम लोगों, विशेषकर ज़िम्मेदार मंत्रियों, को चाहिए कि जनता को यह समझायें कि कांग्रेस ने जिस स्वतंत्रता को हासिल करने के लिए यह आंदोलन शुरू किया है, वह स्वतंत्रता जनप्रतिनिधियों को पहले से ही हासिल है.

कुछ मामलों में आपात स्थिति में यह स्वतंत्रता कुछ सीमित हो सकती है. भारत वासियों को अंग्रेज़ों पर भरोसा करना चाहिए-ब्रिटेन की खातिर नहीं, और न ही ऐसे किसी लाभ की खातिर जो अंग्रेज़ों को इससे होगा-बल्कि प्रांत की सुरक्षा और स्वतंत्रता बरकरार रखने के लिए. गवर्नर बतौर आप प्रांत के संवैधानिक प्रमुख होंगे और पूरी तरह से अपने मंत्री के परामर्श से काम करेंगे..

अब आप स्वंय ही आकलन करें कि, मुख़र्जी कितने बड़े देश भक्त हुआ करते थे….

नेहाल रिज़वी
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भक्त

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