एक प्रियंका अनेक चर्चा, राहुल के छिंदवाड़ा से लड़ने की अटकलें

अजय कुमार, लखनऊ

नवनियुक्त कांग्रेस महाचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश क प्रभारी प्रियंका गांधी को लेकर उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी भले खुश नजर आ रहे हों,लेकिन इस हकीकत को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि फिलहाल प्रियंका के सियासी कैरियर में कोई कामयाबी का चैप्टर नहीं खुला है। मॉ सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी को जीत दिलाने के लिये प्रियंका ने 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी संसदीय क्षेत्र की खूब खाक छानी थीं, मॉ को जिताने के लिये दर-दर भटकी थीं तो भाई के लिए भी उन्होंने कम मेहनत नहीं की थी, लेकिन उनके लगातार प्रचार के बाद भी सोनिया और राहुल की जीत का अंतर बढ़ने की बजाए कम ही होता चला गया।

2009 में बेटे राहुल गांधी के लिये अमेठी छोड़कर जब सोनिया रायबरेली चुनाव लड़ने आईं थीं तो उन्हें मात्र 58.75 प्रतिशत वोट मिले थे, इसके बाद 2006 के उप-चुनाव में सोनिया की जीत का प्रतिशत 80.49 तक पहुंच गया था। दरअसल, 2004 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उनके ऊपर राष्ट्रीय सुझाव समिति का अध्यक्ष होने के कारण सोनिया गांधी पर लाभ के पद पर होने के साथ लोकसभा का सदस्य होने का आक्षेप लगा जिसके फलस्वरूप 23 मार्च 2006 को उन्होंने राष्ट्रीय सुझाव समिति के अध्यक्ष के पद और लोकसभा का सदस्यता दोनों से त्यागपत्र दे दिया। मई 2006 में वे रायबरेली, उत्तरप्रदेश से पुन सांसद चुनी गईं और उन्होंने अपने समीपस्थ प्रतिद्वंदी को चार लाख से अधिक वोटों से हराया।

2006 में अपने दम पर 80.49 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली सोनिया गांधी की मदद के लिये जब 2009 के लोकसभा चुनाव के समय प्रियंका गांधी ने रायबरेली में मोर्चा संभाला तो लगा की जीत का अंतर और बढ़ जायेगा, क्योंकि कांग्रेसियों को प्रियंका में इंदिरा नजर आती थीं। मीडिया ने भी ऐसी खबरों को खूब सुर्खिंया दी थीं,लेकिन आश्चर्यजनक रूप से सोनिया गांधी के वोट प्रतिशत में 8.26 प्रतिशत वोटों की कमी आई और उनके वोट प्रतिशत का आंकड़ा 80.49 से गिरकर 72.23 पर सिमट गया। यह तब हुआ जबकि 2006 के उप-चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी ने 2009 में सोनिया के खिलाफ अपना कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा था।अगर समाजवादी प्रत्याशी भी होता तो यह अंतर और भी कम हो सकता था। निचोड़ यही था कि प्रियंका कोई करिश्मा नहीं कर पाईं थीं। जीत का अंतर कम होने के बाद भी प्रियंका पर कोई चर्चा नहीं हुई। क्योंकि कांग्रेस में यह परम्परा रही है कि नेहरू-गांधी परिवार को जीत का तो श्रेय दिया जाता है,लेकिन हार का ठीकरा कार्यकर्ताओं एवं अन्य नेताओं के सिर फोड़ दिया जाता है।

बात 2014 की कि जाए तो उस समय पूरे देश में मोदी लहर चल रही थीं,लेकिन इससे रायबरेली से सोनिया गांधी और अमेठी से राहुल गांधी की चुनावी सेहत पर असर पड़ने का अनुमान किसी को नहीं था। इसकी वजह थी केन्द्र में कांग्रेस गठबंधन सरकार का होना जिसमें सोनिया-राहुल की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं खड़क सकता है। यह दोनों नेता अपने संसदीय क्षेत्र के विकास के लिये सरकारी तिजोरी का रूख आसानी से अपने संसदीय क्षेत्र में मोड़ सकते थे। इसके अलावा प्रियंका गांधी भी मोर्चा संभाले हुए थीं,परंतु 2014 में भी प्रियंका का जादू चल नहीं सका। सोनिया की जीत का प्रतिशत 63.80 पर पहुच गया जो 2006 से करीब 13 प्रतिशत और 2009 के लोकसभा चुनाव से 8.43 प्रतिशत कम था। समाजवादी पार्टी ने 2014 में भी सोनिया के खिलाफ कोई प्रत्याषी नहीं उतारा था। मगर प्रियंका पर उंगली इस बार भी नहीं उठी।

बात अमेठी की कि जाये तो यहां भी प्रियंका अपने भाई को बड़ी जीत दिलाने के लिये कोई नजीर नहीं पेश कर सकीं। 2009 में सपा की गैर-मौजूदगी में जहां राहुल गांधी को 71.78 वोट मिले थे,वहीं 2014 में प्रियंका के अथक प्रयासों के बाद भी उनकी जीत में 25.07 प्रतिशत गिरावट आईं। बीजेपी ने यहां से टीवी कलाकार स्मृति ईरानी को उतारा था, जिन्होंने प्रियंका गांधी की एक नहीं चलने दीं। तेजतर्रार ईरानी ने कुछ समय के प्रचार में बीजेपी के वोटों में आश्चर्यजनक रूप से 28.57 प्रतिशत वोटों का इजाफा कर दिया था। यह संकेत न तो राहुल के लिये अच्छे थे और न प्रियंका के लिये लेकिन यहां भी कांग्रेसी परम्परा को निभाया गया और राहुल-प्रियंका पर किसी तरह की उंगली नही उठाई गई।

बीजेपी नेत्री स्मृति ईरानी चुनाव हार भले गईं, लेकिन उन्होंने अमेठी से नाता नहीं तोड़ा। अबकी बार स्मृति ईरानी फिर अमेठी से चुनाव लड़ सकती हैं। अटकलें तो यह भी लग रही हैं कि स्मृति ईरानी की चुनावी तैयारियों से डरे राहुल गांधी अमेठी से पलायन कर सकते हैं। उनके मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से चुनाव लड़ने की बात कही जा रही है। छिंदवाडा संसदीय सीट पर आठ बार कांग्रेस नेता कमलनाथ चुनाव जीत चुके हैं। वर्तमान में भी वह वहीं से सांसद हैं। एममी का सीएम बनने के बाद अब यह सीट खाली हो जायेगी। कमलनाथ ने ही राहुल गांधी को छिंदवाड़ा से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव भेजा है। राहुल के छिंदवाड़ा से और प्रियंका के अमेठी से चुनाव लड़ने की संभावना इस लिये भी हैं क्योंकि हाल ही के अपने अमेठी दौरे के दौरान जनता से संवाद स्थापित करते हुए राहुल गांधी ने कहा भा था कि प्रियंका आयेंगी तो सबसे पहले आप लोंगो के दर्शन करेंगी।

खैर, बात प्रियंका से कांग्रेस को हुए फायदे-नुकसान की कि जाए तो 2009 और 2014 में उन्होंने अपनी माँ और भाई के निर्वाचन क्षेत्रों रायबरेली और अमेठी में नियमित रूप से दौरा किया और जहां उन्होंने लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया था। वह अपने चारो तरफ अपार जनता को आकर्षित करने में सफल भी रही थीं। अमेठी में प्रत्येक चुनाव के समय एक लोकप्रिय नारा लगता है ‘अमेठी का डंका, बिटिया प्रियंका।’ प्रियंका की गणना अच्छे, सुलझी और सफल आयोजको में की जाती है और उन्हें अपनी माँ की ‘मुख्य राजनीतिक सलाहकार’ भी माना जाता है,लेकिन कांग्रेस को वोट दिलाने के मामले में वह पिछड़ गईं।

2004 के भारतीय आम चुनाव में, वह अपनी माँ की चुनाव अभियान प्रबंधक थी और अपने भाई राहुल गाँधी के चुनाव प्रबंधन में मदद की। एक प्रेस वार्ता में इन्ही चुनावों के दौरान उन्होंने कहा था,‘राजनीति का मतलब जनता की सेवा करना है और मैं वह पहले से ही कर रही हूँ। मैं इसे पांच और अधिक सालों के लिए जारी रख सकती हूँ। इस बात से यह अटकलें तेज हो गई कि वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के लिए कोई जिम्मेदारी वहन कर सकती हैं।

लोकसभा चुनावों की तरह से 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, जहाँ राहुल गाँधी ने राज्यव्यापी अभियान का प्रबंधन किया, वही वह अमेठी रायबरेली क्षेत्र के दस सीटों पर ध्यान केंद्रित कर रही थी, वहां दो सप्ताह बिता कर उन्होनें पार्टी कार्यकर्ताओं में मध्य सीटों के आवंटन को लेकर हुई, अंदरूनी कलह को सुलझाने की कोशिश की। लेकिन यहां भी प्रियंका का जादू नहीं चल पाया। कुल मिलाकर, कांग्रेस राज्य में हासिये पर चली गई, उसे 402 में से मात्र 22 सीटों पर ही जीत हासिल हुई, जो की इन दशकों में न्यूनतम थी। लेकिन, इसमें व्यापक रूप से प्रियंका गाँधी के अन्तर संगठनात्मक गुण और वोट खींचने की क्षमता का पता चलता है, जिस कांग्रेस को 2002 के विधानसभा में सिर्फ दो (दस में से) सीटें हासिल हुई थी, उसने सात सीटें हथिया ली, इन सभी सीटों पर महत्वपूर्ण बढ़त प्राप्त हुई, जो कि कार्यकर्ताओं में पार्टी अंतर्कलह के बावजूद संभव हुआ।

बहरहाल, इस बार कांग्रेस के लिये रायबरेली और अमेठी में खुला मैदान है। उसे सिर्फ भाजपा से टक्कर मिलेगी। सपा-बसपा गठबंधन के नेताओं ने साफ कर दिया है कि वह अमेठी और रायबरेली में अपना प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। इसके पीछे की वजह भी फ्रैंडली फाइट ही है। सपा-बसपा नेता नहीं चाहते हैं कि उनके चुनाव मैदान में कूदने के चलते पूरे देश में प्रचार करने की बजाए राहुल और सोनिया गांधी अपने संसदीय क्षेत्रों में फंस कर न रह जाएं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

भक्त

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