सवर्ण आरक्षण तो ठीक लेकिन रोजगार है कहाँ सरकार?

कृष्णमोहन झा

गरीब सवर्णों को शिक्षा एवं नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने वाला संविधान संशोधन विधेयक मोदी सरकार ने संसद में पेश किया तो उसके पारित होने में कोई संशय नहीं था। मोदी केबिनेट ने जब इस प्रस्ताव पर मुहर लगाईं तब ही अधिकांश दलों ने इसके समर्थन की घोषणा कर दी थी। इसलिए सरकार ने संसद में इसे पुरे आत्मविश्वास के साथ पेश किया और बिना किसी ख़ास विरोध के यह दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया। संसद में पारित होने के बाद राष्ट्र्पति ने भी इस विधेयक पर साइन कर गरीब सवर्णों की वर्षों पुरानी मांग को पूरा करने में देर नही की। इस विधेयक का समर्थन करने वाले सारे दल जनता को यह सन्देश देना चाहते थे कि सरकार यह विधेयक अभी लेकर आई है, लेकिन वे तो सालों से इसके लिए आवाज उठा रहे है। इसलिए इसके लिए शाबासी तो विरोधी दलों को ही मिलनी चाहिए।

उधर मोदी सरकार यह दावा कर रही है कि सबका साथ ,सबका विकास का जो नारा उसने दिया था ,उसके क्रियान्वयन के लिए वह पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मोदी सरकार यदि यह दावा कर रही है कि जो काम पूर्व की सरकारें 70 सालों में नहीं कर पाई है ,उसे उसने चंद वर्षों में ही कर दिखाया है ,तो यह दावा करने का उन्हें अधिकार भी है क्योंकि मोदी सरकार के इस फैसले को ऐतिहासिक कदम कहना गलत नहीं होगा। इधर सारे विपक्षी दलों ने इस विधेयक के समर्थन में वोट देकर यह साबित करने की कोशिश की है उन्हें भी सवर्ण समाज के गरीब तबकों की चिंता है। इसलिए उन्होंने भी सरकार के सारे घोर विरोध को भूलकर इसे समर्थन दिया है। ये दल इसका विरोध करके जनता के कोप का भाजन नहीं बनना चाहते थे। हालांकि सारे विपक्षी दल इसे सरकार का चुनावी स्टंट कहने से भी नहीं चुके।

इस फैसले को लेकर मोदी सरकार की मंशा भी लोकसभा चुनाव में अपनी संभावनाओं को मजबूत करने की ही रही है। एट्रोसिटी एक्ट को लेकर सवर्ण समाज की नाराजगी का खामियाजा भाजपा को तीन राज्यों के चुनाव परिणामों में भुगतना पड़ा है। नोटा में पड़े वोटो को देखकर मोदी सरकार स्तब्ध रह गई है।ऐसा माना जा रहा है कि नोटा की बटन दबाने वाले मतदाताओं में ऐसे लोगो का प्रतिशत अधिक है ,जो सवर्णों के प्रति सरकार की उपेक्षा भाव से रुष्ट थे। अगर सरकार ने समय रहते इन्हे मनाने की कोशिश की होती तो भाजपा को तीन राज्यों में नुकसान नहीं होता। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दम्भोक्ति की भी हार में बड़ी भूमिका रही है ,जिसमे उन्होंने कहा था कि कोई भी माई का लाल आरक्षण ख़त्म नहीं कर सकता है।

तीन राज्यों के चुनाव में सवर्ण समाज एवं किसानों की नाराजगी दो ऐसे कारण थे जिसने भाजपा को सत्ता से दूर कर दिया। इससे घबराई केंद्र की मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्हें एक बार फिर अपने पाले में करने की कोशिश की है। दरअसल मोदी सरकार आरक्षण देने के बल पर जनता को यह भरोसा दिलाना चाहती है कि आगामी चुनाव में उसे एक बार फिर से जनादेश मिलता है तो वे इसके मार्ग में आने वाली हर एक बाधा को दूर करने का काम करेगी। इधर विरोधी दल सरकार को अब इस बात से भी घेर रहे है कि उसे यदि सवर्णों की इतनी ही चिंता थी तो उसने इसे अपने कार्यकाल के अंतिम समय में ही क्यों लाने की कोशिश की। पूर्व के साढ़े चार सालों में इसे क्यों नहीं लाया गया। खैर विरोधी अब चाहे जो कहे लेकिन सरकार ने सरकार ने सवर्णों में अपनी पैठ जमाने के लिए दाव तो चल ही दिया है।

अब आगे ऐसी संभावनाएं भी व्यक्त की जा रही है कि मोदी सरकार किसानों के लिए भी कोई बड़ी योजना लेकर सामने आ सकती है। तीन राज्यों में भाजपा की हार में किसानों की नाराजगी भी बड़ा मुद्दा रही है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में कर्ज माफ़ी की घोषणा की एवं सत्ता में आते ही जिस तरह उसे पूरा किया है उसने भी मोदी सरकार के कान खड़े कर दिए है। इसीलिए नाराज किसानों के लिए केंद्र सरकार कोई बड़े पैकेज की घोषणा कर दे तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सरकार यही चाहेगी कि कांग्रेस सरकार के कर्ज माफ़ी के कदम से ज्यादा आकर्षण उसके पैकेज में हो।

गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के मोदी सरकार के फैसले से उन लोगो में असंतोष होना स्वाभाविक है जो बाकि बचे 40.5 प्रतिशत के दायरे में आएँगे। अब उनके असंतोष की चिंता भी भाजपा को हो सकती है । दरअसल आरक्षण को चुनावों में जिस तरह अपनी संभावनाओं को बढ़ाने के लिए राजनीतिक दल इस्तेमाल करते है उससे समाज में विभाजन की भूमिका ही तैयार हुई है। आज स्थिति यह है कि कोई भी दल आरक्षण पर सवाल खड़े करने का साहस नहीं उठा पाता है। इस प्रश्न का उत्तर कोई भी राजनीतिक दल क्यों नहीं खोजने की कोशिश करता है कि आखिर वह दिन कब आएगा जब आरक्षण से हर वर्ग परहेज करने लगे। राजनीतिक दल यह क्यों नहीं सोचते कि फिलहाल आवश्यकता आरक्षण की नहीं बल्कि नए रोजगार पैदा करने की है। यदि रोजगार के भरपूर अवसर सामने होंगे तो आरक्षण की जरुरत ही नहीं पड़ेगी।

(लेखक कृष्णमोहन झा IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक हैं)

भक्त

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