RSS की वफ़ादारी किसके प्रति?

नेहाल रिज़वी

RSS न तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और न ही स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय ध्वज के प्रति वफ़ादारी में विश्वाश रखता है.दिसम्बर 1929 में कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज को राष्ट्रीय ध्येय घोषित करते हुए लोगों से आह्वान किया था कि 26 जनवरी 1930 को तिरंगा झंडा फहराएं और स्वतंत्रता दिवस मनाएं.इसको नज़रअंदाज़ करते हुए, RSS के संस्थापक और तत्कालीन सरसंघचालक केशव बलीराम हेडगेवार (डॉक्टर जी) ने एक आदेश-पत्र जारी करके तमाम शाखाओं को भगवा झंडा, राष्ट्रीय झंडे के तौर पर पूजने के निर्देश दिये. इस आदेश का उद्देश्य साफ़ था कि संयुक्त आज़ादी की लड़ाई की निशानी, तिरंगे झंडे को दरकिनार कर दिया जाए.

RSS ने कभी राष्ट्रीय झंडे का सम्मान तो नहीं किया पर इसे अपने स्वार्थ के लिए ज़रूर इस्तेमाल करता रहा है.इसके कार्यकर्ता जम्मू और कश्मीर की राजधानी,श्रीनगर के लाल चौक में धूम-धाम से तिरंगे झंडे को फहरा कर और इस्लामी मदरसों के ऊपर तिरंगा झंडा लहराने की मांग करके,राष्ट्र विरोधी ताक़तों को चुनौती देने का दावा करते हैं,लेकिन यह सब करते हुए इनका उद्देश्य तिरंगे झंडे के बारे में इनकी घृणा पर पर्दा डालना ही होता है.

इस सच्चाई को झुठलाना मुश्किल है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब तिरंगा झंडा अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ भारतीय जनता की संयुक्त लड़ाई का प्रतीक था तब भी RSS के लिए उसकी कोई अहमियत नहीं थी.और आज जबकि यह राष्ट्रीय-ध्वज है,RSS इसे बदनाम करने का कोई अवसर नहीं छोड़ता. RSS के अंग्रेज़ी मुख्यपत्र ‘आर्गनाईज़र’ ने सविंधान सभा की समिति में सभी दलों और सभी समुदायों को मंज़ूर तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मांन लेने के फ़ैसले की ख़बर पर प्रतिक्रिया जताते हुए ‘दि नेशनल फ्लैग’ शीर्षक से 17 जुलाई,1947 के अपने संपादकीय में लिखा:

हम इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं कि राष्ट्रीय झंडा ‘देश के सभी दलों और समुदायों को स्वीकार्य होना चाहिए’. यह निरि बेवकूफ़ी है.झंडा राष्ट्र का प्रतिनिधि करता है और देश में केवल एक ही राष्ट्र है,हिन्दू राष्ट्र,जिसका लगातार चलने वाला 5000 साल का इतिहास है.हमारा झंडा इसी राष्ट्र और केवल इसी राष्ट्र का प्रतीक होना चाहिए. हमारे लिए यह मुमकिन नहीं कि हम एक ऐसा झंडा चुनें जो सभी समुदायों की इच्छाओं और आकांक्षाओं को संतुष्ट कर सके.ये बिल्कुल ग़ैर ज़रूरी,अनुचित है और पूरे मामले को और उलझा देता है…. हम अपने झंडे को उस तरह नहीं चुन सकते हैं जैसे कि हम एक दर्ज़ी को एक क़मीज़ या कोट तैयार करने के लिय कहते हैं….

14 जुलाई 1946 को RSS के दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने गुरूपूर्णिमा के अवसर पर नागपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए हर बार की तरह फ़िर से दावा किया कि केवल भगवा झंड़ा ही महान भारतीय संस्कृति को दर्शाता है. उन्होंने ज़ोर देकर यह भी कहा कि भगवा झंडा ही भगवान का रूप है.

गोलवलकर के शब्दों में :

हमारी महान संस्कृति का परिपूर्ण परिचय देने वाला प्रतीक स्वरूप हमार भगवा ध्वज है जो हमारे लिए परमेश्वर स्वरूप है.इसीलिए इसी परम वंदनीय ध्वज को हमने अपने गुरुस्थान में रखना उचित समझा है… हमारा दृढ़ विश्वाश है कि अंत में इसी ध्वज के समझ सारा राष्ट्र नमस्तक होगा.

स्वतंत्रता की पूर्वसंध्या पर जब दिल्ली के लाल किले से तिरंगे झंडे को लहराने की तैयारी चल रही थी, RSS ने अपने मुख्यपत्र (आर्गनाइज़र) के 14 अगस्त 1947 वाले अंक में राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर तिरंगे के चयन की खुलकर भर्त्सना करते हुए लिखा:

वे लोग जो किस्मत के दावं से सत्ता तक पहुंचे हैं भले ही हमारे हाथों में तिरंगे को थमां दें,लेकिन हिन्दुओं दुवारा न इसे कभी सम्मानित किया जा सकेगा तीन का आँकड़ा अपने आप में अशुभ हैं और एक ऐसा झंडा जिसमें तीन रंग हों बेहद ख़राब मनोवैज्ञानिक असर डालेगा और देश के लिए नुक़सानदेह होगा…

स्वतंत्रता के बाद जब तिरंगा झंडा राष्ट्रीय-ध्वज बन गया तब भी RSS ने इसको स्वीकारने से मना कर दिया. गोलवलकर ने राष्ट्रीय झंडे के मुद्दे पर अपने लेख ‘पतन ही पतन’ में लिखा:

कौन कहता है कि यह एक शुद्व तथा स्वस्थ राष्ट्रीय दृष्टिकोण हैं? यह तो केवल एक राजनीति की जोड़तोड़ थी,केवल राजनैतिक कामचलाऊ तात्कालिक उपाय था.यह किसी राष्ट्रीय दृष्टिकोण अथवा राष्ट्रीय इतिहास तथा परंपरा पर आधारित किसी सत्य से प्रेरित नहीं था.वही ध्वज आज कुछ छोटे से परिवर्तनों के साथ राज्य ध्वज के रूप में अपना लिया गया है.हमारा एक प्राचीन तथा महान राष्ट्र है,जिसका गौरवशाली इतिहास है.तब, क्या हमारा कोई ध्वज नहीं था? क्या कोई राष्ट्रीय चिन्ह नहीं था? नि:संदेह, वह था. तब हमारे दिमागों में यह शून्यतापूर्ण रिक्तता क्यों?

अगर आज भी आपको ऐसा लगता है कि RSS का तिरंगे झंडे और गांधी के प्रति कोई झुकाओ है, तो आप पूर्णरूप से ग़लत हैं..

लेखक नेहाल रिज़वी युवा पत्रकार हैं.

भक्त

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