स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों और आज़ादी का अपमान तो न करो!

आज़ाद ख़ालिद

देश की सबसे समस्या के तौर पर अगर देखा जाए तो बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ, आम नागरिकों की सुरक्षा के अलावा देश का विकास और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित माहौल सबसे चुनौती के तौर पर देखा जा सकता है। दरअसल ये हमारा सौभाग्य ही है कि हम स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं। यहां का अपना संविधान है, सुप्रीमकोर्ट है, अपना क़ानून है। सैंकड़ों साल की ग़ुलामी के ख़िलाफ़ हज़ारों देशभक्तों की क़ुर्बानी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद समेत अनगिनत नौजवानों की जानों के न्योछावर करने के बाद 1947 में भारत को स्वंतंत्रता मिली। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने एक बेहद सुंदर संविधान भारत को दिया। हालांकि देश के बंटवारे ने हमारी आज़ादी की ख़ुशी में कड़ुवाहट घोल दी थी। इस देश की जनता ने क़ुतुबुद्दीन एबक़, ग़ुलाम वंश, ख़िलजी, मुग़ल, पुर्तगाली, फ्रांसीसी समेत कई बाहरी लोगों की ग़ुलामी को सैंकड़ो साल झेला और सहा। लेकिन भारत वासियों ने पुराने ज़ख़्मों को भुलाकर संविधान, देश के क़ानून के साए में देश को आगे बढ़ाने के लिए एकजुट होकर विकास की दौड़ में शामिल हो गये।

एक संवैधानिक गणतंत्र के तौर पर 1947 के बाद देश में हिंदु, मुस्लिम, सिख और ईसाई आपस में भाई भाई का नारा लगा और देश ने दुनियां के सामने विकास का नया इतिहास पेश किया। लेकिन अफसोस 23 दिसंबर 1949 की रात जब फैज़ाबाद के अयोध्या की बाबरी मस्जिद में रात को ईशा की नमाज़ के बाद वहां के लोग अपने अपने घर चले गये तो वहां कुछ लोगों ने मस्जिद में मूर्तियां रख दीं और बाबररी मस्जिद बनाम राम मंदिर के विवाद में पुलिस एक एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। जो आज भी रिकार्ड में मौजूद है। इस मामले का अफसोसनाक पहलु ये भी है कि सैंकड़ो साल पुरानी मस्जिद को विवादित स्थल बताकर रातों रात बंद कर दिया गया। ठीक ऐसे ही जैसे किसी के घर में कोई दबंग क़ब्ज़ा कर ले और पुलिस दंबग के ख़िलाफ कार्रवाई करने के बजाय कमज़ोर को कहे कि मामला विवादित हो गया इस्लिए अब आप भी इस घर से बाहर ही रहिए। यानि दंबग की ऑटोमेटिक जीत। हांलाकि कुछ लोग ऐसा ही आरोप बाबर पर या मुग़लों पर भी लगता है। लेकिन पहली बात तो ये कि एक राजशाही के मुक़ाबले में अब हम एक संवैधानिक सिस्टम (जहां क़ानून है, संविधान है जनता की चुनी हुई सरकार है) को मानते हैं। इसके अलावा किसी भी जगह पर जबरन कब्ज़े के बाद कोई मस्जिद नहीं बनाई जा सकती ऐसा इस्लामिक जानकारों का मानना है।

बहरहाल 1949 में मस्जिद में जबरन मूर्तियां रख दीं गई कांग्रेस की केंद्र और राज्य की सरकार मस्जिद को ही बंद कर दिया। लेकिन इसके बाद दूसरा घिनौना मज़ाक़ ये किया गया कि कांग्रेसी सरकार ने न सिर्फ मूर्तियों को वहीं रखा रहने दिया, बल्कि मस्जिद में ही ताला डाल दिया। इसके बाद कांग्रेसी सरकार ने सैंकड़ों साल पुरानी मस्जिद में पूजा करने के लिए ताल भी खोल दिया। जबकि मस्जिद में नमाज़ पढ़ने को ये कहकर रोके रखा कि मामला विवादित है। हो सकता है कि सैंकड़ो साल पहले तलवार के युग में बाबर ने नाइंसाफी की हो, ये भी ह सकता है कि अंग्रेजों ने जाते जाते हमे भिड़ाने के लिए नया शिगूफा छोड़ दिया हो। ये भी हो सकता है कि कांग्रेस ने अपनी राजनीति चमकाने और देश की असल समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए ये सब गेम प्लान बनाया हो। लेकिन ये भी सच है कि आज भी कुछ लोग इसी नाम पर सत्ता तक जाते रहे हैं।

1949 से चल रहे इस खिलवाड़ का सबसे ख़तरनाक मोड़ 1992 में तब आया कि दिल्ली में कांग्रेस की सरकार और यूपी में बीजेपी की सरकार की मौजूदगी में सुप्रीमकोर्ट के आदेशों को पैरों तल रौंदते हुए बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया गया। 2 जनवरी 2019 में चर्चा इस बात की है कि आख़िर राम मंदिर कब बनेगा। राम मंदिर सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद बनेगा या इस पर सरकार अध्यादेश लाएगी। लेकिन ये सवाल कौन उठाएगा कि बाबरी मस्जिद को शहीद किये जाने के बाद उस वक़्त के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव ने देश की जनता से कहा था कि वो इस पर शर्मिंदा हैं और वादा किया था कि बाबरी मस्जिद वहीं बनाई जाएगी। एक प्रधानमंत्री का वादा, सुप्रीमकोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए बाबरी मस्जिद को तोड़ा जाना, संविधान में दिये गये अधिकारों समेत कई सवालों का जवाब कब दिया जाएगा।

लेकिन देश के सभी राजनीतिक लोग अपनी ज़िम्मेदारी से मुंद मोड़ते हुए सरकार से जिस तेज़ी के साथ ये पूछते हैं कि राम मंदिर कब बनेगा, उसी भाषा में ये कब पूछेंगे कि बाबरी मस्जिद पर देश कब जबाव दिया जाएगा। राम मंदिर का कोई विरोधी नहीं है। जो लोग राममंदिर बनाने के नाम पर सरकार में आए वो इस पर कब जवाब देंगे। लेकिन बाबरी मस्जिद, संविधान की आत्मा, सुप्रीमकोर्ट के आदेशों को तोड़ने वाली घटना पर देश कब जवाब देगा। क्या हम इतना बड़ा दाग़ लेकर ये कह पाएंगे की देश को आज़ाद कराने वाले शहीदों के सपने के भारत में क़ानून का राज लागू है। साथ ही क्या उन्होने देश की आज़ादी के लिए जब उन्होने अपनी जान क़ुर्बान की थी तब उन्होने सोचा था कि आने वाले दिनों में यही सब होगा। आज सभी भारतवासियों से एक अपील करने का नम है कि सैंकड़ों साल की ग़ुलामी से बड़ी क़ुर्बानियों के बाद हमारे पूर्वजों ने देश को स्वतंत्र कराया था, कृपया अपनी संकीर्ण राजनीति और विद्वेश के चलते देश का माहौल न ख़राब करें। हिंदु मुस्लिम भारत के चमन के दौ बेहतरीन गुलदस्ते हैं। किसी को हराकर हम जीत भी जाएं तो जीत कैसी। ये सच है हर हिंदु मंदिर नहीं जाता न ही मुसलमान मस्जिद ही जाता है। लेकिन इंसान अस्पताल भी जाता है, स्कूल भी जाता है, परिवार चलाने के लिए रोटी भी चाहता है। देश को ऐसा माहौल दो जो सबके लिए जीने का माहौल पैदा कर सके।

(लेखक- आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार है डीडी आंखों देखी, सहारा समय, इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज़ समेत कई राष्ट्रीय चैनलों में कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में जे.के24×7 न्यूज़ में बतौर सीनियर न्यूज़ एडिटर कार्यरत है।)

भक्त

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1 comment

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  • मतलब कुछ भी ऊँटपटाग लिख दो ?
    याने कहानी 1949 से ही शुरू होती है ?
    याने किसी के घर में ज़बरदस्ती घुस कर दो चार पीढ़ी गुज़ार दो तो कब्ज़ा जायज़ हो गया ?
    याने मंदिर मस्जिक एक से हो गए ?
    याने झूठ लिखने का ठेका ले लिया है ?
    अगर सुप्रीम कोर्ट का ऐसा ही आदेश था तो क्यों नहीं कोर्ट ने दुबारा मस्जिद बनाने का आदेश दिया या किसी ने माँगा क्यों नहीं ?
    इस देश में BJP प्रोपगंडे में कम नहीं है लेकिन लगता है उसको पछाड़ने में कुछ लोग दुगनी रफ़्तार से प्रोपगंडा करने लगे हैं !!

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