मोदी सरकार ने कारपोरेट घरानों पर पैसा लुटाया, शिक्षा का बजट घटा दिया!

निहाल रिज़वी

यह नरेंद्र मोदी सरकार की ही है जिसने स्वतंत्र भारत के इतिहास में युवा पीढ़ी की शिक्षा के लिए अब तक का सबसे कम बजट दिया है. यूपीए सरकार के अंतिम वर्ष 2013-14 में शिक्षा के छेत्र पर केंद्रीय बजट का 4.77% ख़र्च किया जाता था जो कि मोदी सरकार के शासन में 2018-19 आते-आते ज़बरदस्त गिरावट के साथ महज़ 3.48% तक पहुँच चुका है. दूसरी ओर, मोदी सरकार ने अपने पसंदीदा कार्पोरेट घरानों को कि गई टैक्स माफ़ी और उनके द्वारा बैंकों से डकारे गए ऋण अर्थात एनपीए कि रक़म अब लगभग 10.5 लाख करोड़ तक पहुँच चुकी है…

शिक्षा में हो रही भारी बजट कटौती के पीछे मोदी सरकार द्वारा भारतीय उच्च शिक्षा को एक बिक्री योग्य सेवा बना देने के WTO से किए गए वायदे पर चलना है. विश्व व्यापार संगठन के प्रति अपनी बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं को मानते हुए भारत सरकार ने सार्वजनिक छेत्र के विश्वविद्यालयों को दी जा रही सब्सिडी और फंड में भारी कटौती की है..

इसके चलते ही आज देश भर के शैक्षणिक संस्थान फंड की कमी झेल रहे हैं और आम छात्रों पर भारी फीस- बढ़ोतरी थोपी जा रही है. एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 3 सालों में विश्विधालय और उच्च शिक्षा शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की संख्या में करीब 2.34 लाख की कटौती की गई है.

शिक्षा और कौशल विकास के लिए नीतियाँ निर्धारित करते समय नीति आयोग जानबूझकर इस बात का ज़िक्र नहीं करता कि “60% बच्चे दसवीं कक्षा तक आते-आते स्कूल छोड़ देते हैं” ( रमेश पटनायक, 2018). वहीं मोदी सरकार सार्वजनिक स्कूलों को पीपीपी मॉडल और दूसरे रास्ते से निजी हाथों में देने और उन्हें बंद करने के रास्ते पर तेज़ी से बढ़ी है.

अकेले झारखण्ड में ही 6000 स्कूलों को बंद या विलय कर दिया गया है ( न्यूज़ क्लिक,अगस्त 2018 ). केंद्र के नीति आयोग ने स्वयं घोषणा किया है कि सरकारी स्कूलों की बेहतरी उसे निजी हाथों में सौंपने में हैं..इसके पक्ष में उन्होंने यह आकंड़ा जुटाया है कि भारत की 3 लाख 70 हज़ार सरकारी स्कूलों ( कुल सरकारी स्कूलों का 36%) में 50 से भी कम छात्रों का नामांकन है (न्यूज़ इंडियन एक्सप्रेस, 7 मई 2017).

पहले सरकार सरकारी स्कूलों को बदतर बनाकर वहां से आम छात्रों को प्राइवेट स्कूलों की ओर धकेलती है और फ़िर इस नाम पर कि वहां कम छात्र हैं उन स्कूलों को निजी हाथों में सौंप रही है..इसी तरह किसी बहाने जनता के पैसे से बने स्कूल, उसकी ज़मीन और उसके तमाम ढांचों को निजी मुनाफ़े के लिए मुहैया करवाया जा रहा है.

इसी प्रकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय न्यूनतम मानक और उच्च प्रमाणीकरण बनाए रखने के नाम पर सार्वजनिक वित्त पोषित विश्वविद्यालयों को भी बंद करने की योजना बना चुका है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम को हटाकर अस्तित्व में आया सरकार द्वारा प्रस्तावित भारतीय उच्च शिक्षा आयोग अधिनियम 2018 एचईसीआई को मानकों पर खरे न उतरने वाले विश्विद्यालयों को बंद करने का अधिकार दे देगा.

भारत में 18 से 23 साल आयु वर्ग के हर 100 लोगों में से मात्र 25.8 लोग ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं.वंचित तबकों में तो सकल नामांकन अनुपात और भी कम है..अनुसूचित जातियों के लिए यह 21.8 है और अनुसूचित जनजातियों के लिए यह 15.9 ही है. मुस्लिम आबादी,जो देश की आबादी का 14.2% हिस्सा है,में से महज़ 5 प्रतिशत ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं.

शोध के छेत्र में डरावने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए यह रिपोर्ट ख़ुलासा करती है कि उच्च शिक्षा के लिए नामांकन करने वाले छात्रों में से महज़ 0.5 फ़ीसदी छात्र ही पीएचडी के लिए नामांकन कर पाते हैं. ऐसे में शिक्षा के प्रति वर्तमान सरकार की नीतियाँ स्थितियों को और भी बदतर बना देगी.

यूजीसी निटिफिकेशन, 5 मई 2016 को देश के सभी विश्विद्यालयों पर थोपकर सरकार ने छात्र शिक्षक अनुपात के नाम पर शोध (एमफिल/पीएचडी) की सीटों में भारी कटौती की है.. यह अधिसूचना छात्रों को विश्विद्यालयों से बाहर धकेल देने का एक बहाना मात्र था.

स्वंय सरकार के अडिशनल सॉलिसिटर जेनरल तुषार मेहता और भाजपा की नेता मोनिका अरोड़ा इस अधिसूचना के पक्ष में कोर्ट में वकील बनें..इस अधिसूचना के चलते पिछले 3 सालों में एमफिल और पीएचडी की हज़ारों सीटें ख़त्म की जा चुकी हैं.

युवा पत्रकार नेहाल रिज़वी से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

भक्त

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