दलित-पिछड़ों को बौद्ध बताने की बेचैनी मुसलमानों और दलित चिंतकों में क्यों?

असित नाथ तिवारी

2008 के अखिर में मैं जब रांची पहुंचा तो मेरे पत्रकार मित्र हरेकृष्ण पाठक ने मेरे लिए पहले से ही रांची के कोकर इलाके में किराए के मकान का इंतजाम कर लिया था। मकान मालिक और उनका परिवार बेहद मिलनसार था लिहाजा दो-चार दिनों में ही मुझसे उनका जुड़ाव होने लगा। मकान का बड़ा हिस्सा किराए पर था और मुझ जैसे कई किराएदार उस मकान में थे। तमाम किराएदार और मकान मालिक का परिवार एक बड़े परिवार की तरह लगते थे।

कुछ दिनों बाद बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि मकान मालिक इसाई हैं और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारी हैं। इतना ही नहीं उस मकान में किराए पर रहने वाले कई लोगों का उन्होंने धर्मांतरण करवाया था और उन्हें इसाई बनाया था। धर्मांतरण की वजह से इसाई समुदाय में उनकी बड़ी दखल थी और रांची और उसके आसपास के चर्च और मिशनरी में उनको खास महत्व मिलता था। ऐसे ही फिर कुछ दिनों बाद पता चला कि उनके पिताजी रिटायर्ड वनकर्मी हैं और कई बीमारियों से जूझते हुए बूढ़ी पत्नी के साथ बेटे से अलग गांव में रहते हैं। बूढ़ा-बूढ़ी हिंदू धर्म के थे और बेटे-बहू के धर्मांतरण से नाराज होकर इनसे रिश्ते तोड़ चुके थे।

रांची का वो छोटा प्रवास कई मायनों में बेहद खास रहा। मेरे मकान मालिक और उनकी पत्नी ने मुझे इसाई धर्म के संबंध में बहुत कुछ बताया और कई धार्मिक आयोजनों में मुझे शामिल भी किया। बाद के दिनों में मुझे पता चला कि उस मकान में रहने वाले एक हिंदू यादव नवयुवक ने जब धर्म परिवर्तन किया तो किसी चर्च के जरिए उसकी एक नौकरीपेशा ANM से शादी करवाई गई और किसी मिशनरी ने उसे कुछ रकम और मोटरसाइकिल गिफ्ट की। ऐसी ही बहुत सारी हैरान करने वाली जानकारियां मिलती रहीं और मैं उनकी पुष्टि करता रहा।

इसी बीच रविवार की एक सुबह मेरे मकान मालिक अचानक मेरे कमरे में चाय के साथ दाखिल हुए। दिसंबर के शुरुआती हफ्ते में सबेरे-सबेरे गरम चाय देखकर ही ताजगी आ गई थी। चाय के साथ थोड़ी गपशप में ये पता चला कि शाम को उनके घर कोई धार्मिक कार्यक्रम है जिसमें फादर समेत कई लोग आने वाले हैं और कार्यक्रम में फादर सिर्फ इसलिए आ रहे हैं क्योंकि मेरे मकान मालिक उनसे मुझे मिलवाना चाहते हैं। उस दिन मैं पूरा दिन घर पर ही रहा और खिड़की से कार्यक्रम की तैयारियों को देखता रहा। रात के करीब 8 बजे जब फादर पहुंचे तो मेरे मकान मालिक और उनकी पत्नी मुझे बुलाने आए। मैं बेहद सहजता से उनके साथ गया और फादर से पूरी गर्मजोशी से मुलाकात की।

थोड़ी देर की बातचीत में ये साफ हो गया कि परमेश्वर ने उन्हें मेरे पास भेजा है और परमेश्वर मेरी तमाम समस्याओं को खत्म कर देगा अगर मैं इसाई बन गया तो। इस बीच कई किस्म की खाने की चीजों को मैं अपने उदर में पहुंचा चुका था। घंटे भर की मुलाकात के बाद फादर चले गए तो थोड़ी देर के लिए मैं और मेरे मकान मालिक कमरे से बाहर निकले, टहलने-घूमने के बाद अपनी-अपनी राह पकड़ी।

बाद के दिनों में उसी मकान में रहने वाले मुकेश नाम का एक मेरी उम्र का शख्स मुझसे मिलने-जुलने लगा। कई प्रयासों के बाद मुझे ये बताया गया कि पटना के एक बड़े अस्पताल में करने वाली एक लड़की से वो फादर मेरी शादी करवाना चाहते हैं। शादी के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करने के बाद मुझे एक बार उस लड़की से मिलने को कहा गया। फिर एक दिन अचानक जैसे ही मैं दफ्तर से घर पहुंचा मकान मालकिन मुझे दरवाजे पर ही मिल गईं और मुझसे एक कप चाय पीने का अनुरोध किया। चूंकि मेरा उस घर में हर जगह आना-जाना था लिहाजा चाय के लिए मैं आराम से हॉल में पहुंच गया।

वहां मकान मालिक के बच्चों के साथ एक अनजान लड़की भी मौजूद थी। मकान मालकिन ने बताया कि ये वही लड़की है जिससे फादर मेरी शादी करवाना चाहते हैं। शादी चर्च में होगी और फिर मुझे रांची के कोकर में दो कट्ठा जमीन और एक लाख रुपये दिए जाएंगे। ज़मीन की रजिस्ट्री के कागजों में मेरा धर्म इसाई लिखा जाएगा। ये सब होने पर परमेश्वर मेरा साथ देने लगेगा।

धर्मांतरण का ये गंदा खेल मैं समझ चुका था। तमाम धतकर्म, कुकर्म और कपटों पर आधारित धर्म का ये खेल मुझे सबसे बड़ा अधर्म लगा। और यही अधर्म आज के दौर में तमाम धर्मों की बुनियाद है। अधर्म की बुनियाद पर खड़े धर्म-मजहब आपको धार्मिक बनाने की नैतिक ताकत तो नहीं ही रखते होंगे। झारखंड और बिहार में धर्मांतरण का ये खेल भ्रष्ट आचरण के सहयोग से होता है। इसमें शराब, लड़की, पैसा, जमीन सबकुछ शामिल है।

अब देख रहा हूं यूपी में इसी किस्म का दूसरा खेल हो रहा है। यूपी में दलित और पिछड़ों को बौद्ध बताया जा रहा है। बताने वाले ज्यादातर वो लोग हैं जो खुद मुसलमान हैं। ये खुद न तो बौद्ध धर्म अपनाने वाले हैं और ना ही बौद्ध धर्म को पसंद करने वाले। कुछ वैसे लोग भी हैं जो सोशल मीडिया पर दलित चिंतक के तौर पर जमे हुए हैं और देखते ही देखते ही मालदार लोगों में शामिल हो चुके हैं। ये लोग लगातार ये जताने की कोशिश कर रहे हैं कि दलित और पिछड़ा वर्ग मूलत: बौद्ध धर्म का हिस्सा है और हिंदू धर्म सिर्फ और सिर्फ मनुवादियों का धर्म है।

हैरानी की बात ये है कि इनमें से ज्यादातार लोगों ने मनुस्मृति पढ़ी तक नहीं है लेकिन, इनके लिखे हर लेख में 25-50 जगहों पर मनुवाद शब्द का इस्तेमाल होता है। दलित समाज में फैली अशिक्षा का फायदा उठाकर उनका धर्मांतरण करवाने में विफल इस्लाम के कथित ठेकेदार बेहद चतुराई से दलित समाज को बौद्ध बताने में जुटे हैं। इस काम में इनका सहयोग वो दलित चिंतक भी कर रहे हैं जो देखते ही देखते मालदार लोगों की टोली में शामिल हुए हैं।

जो धर्म कभी लोक जागरण की राह पकड़ता था अब वही धर्म लोकभ्रम पैदा कर रहा है। जो धर्म कभी सत्यनिष्ठ हुआ करता था अब वही धर्म झूठ और फरेब की राह पर चलता दिख रहा है। झूठ और फरेब के जरिए धर्म विस्तार का ये गंदा खेल सिर्फ इसाई, मुस्लिम या बौद्ध धर्म में ही होता होगा ऐसा मैं नहीं मानता। बाकी धर्मों के पाखंडी रक्षक भी ये काम करते ही होंगे। जाहिर है कुकर्मों पर आधारित ये धर्म ही अब अधर्म हो गए हैं और ऐसे धर्मों का अनुसरण करने से बेहतर है कि आप खुद को धर्म और जाति के पाखंड से बाहर निकाल लीजिए। ये धर्म और इन धर्मों के रक्षक धतकर्मों को ही धर्म के तौर स्थापित करने में लगे हुए हैं। बेहतर होगा धतकर्मों को धर्म मानने से इनकार किया जाए।

लेखक असित नाथ तिवारी टीवी पत्रकार और एंकर हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

भक्त

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