इसका न धर्म, न जाति और न गोत्र… ये हत्यारा भीड़तंत्र है!

गौरव शर्मा

बुलन्दशहर : देश की सियासत में बवंडर लाने वाले दादरी के अखलाक हत्याकांड की जांच जिस वक्त इंस्पेक्टर सुबोध कुमार के हाथों में सौंपी गई थी। उस दरमियान किसी ने नहीं सोचा नहीं होगा कि ‘बेशक्ल’ भीड़ की जो जांच सुबोध कर रहे हैं। ऐसी ही भीड़ स्याना के चिंगरावठी में एक दिन उनकी हत्या का कारण बनेगी।

कह सकते हैं कि जांच के उस लंबे अंतराल में भी शायद सुबोध भीड़ के दिमाग की वो नब्ज नहीं टटोल पाए थे। वह नहीं समझ पाए थे कि भीड़ वालों का दिलोदिमाग कितनी उग्र तीव्रता और किस हिंसक दिशा में काम करता है? तभी तो उस भीड़ में से किसी एक ने भेजे में गोली मार इंस्पेक्टर की हत्या कर दी। बेजुते खेत में जीप से उनका लटका(सिर नीचे) शव देख घटना की वीभत्सता को समझा जा सकता था। तमाम कानूनी शक्तियों से लैस सुबोध का महकमा लाचार मुद्रा में है।

वजह चाहे जो हो। किंतु इस हादसे में मां ने उसका लाल, पत्नी ने पति, बहन ने भाई और पिता ने पुत्र तो खो ही दिया। इस लाल की भरपाई कौन करेगा? इसका जवाब न तो सरकार के पास है और न उसकी मशीनरी के? लोगों से, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए पुकारे जाने वाले भारतीय लोकतंत्र में भीड़तंत्र कब और कैसे हावी हो गया? ज्ञात ही न हुआ?

एसआईटी गठित हुई है, जांच एजेंसी जुटी हैं। सिस्टम की खोजबीन में क्या वही छन कर आयेगा जो असल में 3 दिसंबर को हुआ? भीड़ वहां क्यों थी? इंस्पेक्टर सुबोध वहां क्यों पहुंचे? कैसे गौकशी के विरोध में उतारू एक भीड़ हत्यारी बन बैठी? सम्भवत: इस जांच एपिसोड में ज्वलन्त प्रश्नों का एक प्रहर ऐसे ही खड़ा रहे। परन्तु सोचना तो हम- आपको है।

नेक- साफ नीयत से सुबोध का पुत्र भी सोच रहा है। जो कहता है कि भड़काऊ भाषण देने पर आप और मुझमे फर्क क्या? धर्म, जाति और गोत्र पर आधारित आजकल की राजनीति में महीन अंतर को नहीं समझा जा सकता। फिर भी इन्हीं तथाकथित विकसित मुद्दों को लेकर राजनीतिक पार्टियों के राष्ट्रीय व प्रादेशिक प्रवक्ता इसी विभाजन की खाई को बांटने और पाटने में लगे है। प्रश्न है कि क्या चिंगरावठी में भीड़ का धर्म, जाति और गौत्र था? या फिर विगत वर्षों में अजन्मा हत्यारा समूह है? पता चले तो बताईयेगा…?

लेखक गौरव शर्मा पत्रकार हैं.

भक्त

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